गुनाहो का अंत....!

पत्रकार ने अवैध धंधों पर सवाल किया… तो भड़क उठे पुलिस आयुक्त!

पत्रकार ने अवैध धंधों पर सवाल किया… तो भड़क उठे पुलिस आयुक्त!

नागपुर क्राईम ऑपरेशन – 1 फरवरी 26

• -पत्रकार परिषद मे क्या सवाल करना गुनहा हैं? क्यों -जवाब देने से डरे सीपी… क्या अब पत्रकार परिषद मे अधिस्वीकृतधारक पत्रकार बुलायेंगे?
• -डिजिटल मीडिया कि आवाज दबाने कि कोशिश!
-पत्रकारिता पर हमला या सत्ता का घमंड?

नागपुर- रविवार को पुलीस आयुक्त ने पत्रकार परिषद बुलाई. ठीक 1बजे पत्रकार परिषद हुई. 3करोड 34 लाख चोरी मे आरोपी को दबोचा इसकी जानकारी दे रहें थे. फिर सवाल जवाब आया. पत्रकारो ने सवाल किए सीपी ने जवाब दिए, WH NEWS के संपादक विजय खवसे ने एक सवाल पूछा.. सवाल था शहर मे चल रहें अवैध धंदो कि.. लेकिन सीपी साहब ने जवाब नही दिया. आखिर मे फिर खवसे ने जवाब दिया नही सर पूछा तो सीपी गुस्से मे आ गए. पुलिस आयुक्त रवींद्र सिंघल से जब शहर में फल-फूल रहे अवैध धंधों को लेकर सवाल पूछा गया, तो जवाब देने के बजाय पुलिस आयुक्त आपा खो बैठे।

सवाल करना अगर अपराध है, तो फिर पत्रकारिता का अस्तित्व ही क्या रह जाता है?

खवसे ने यह सवाल किसी निजी स्वार्थ, व्यक्तिगत लाभ या दबाव बनाने के लिए नहीं पूछा गया था, बल्कि शहर की कानून-व्यवस्था, अवैध जुआ, सट्टा और नशे के कारोबार को लेकर था.जो सीधे आम नागरिकों के जीवन से जुड़ा मुद्दा है।
पुलिस आयुक्त जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी से यह अपेक्षा थी कि वे संयमित भाषा में यह कहते,
“हम ऑपरेशन थंडर के तहत अवैध जुआ, सट्टा, मादक पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं। यदि आपके पास कोई ठोस जानकारी हो, तो संबंधित अधिकारी को दें, हम निश्चित रूप से कार्रवाई करेंगे।”पत्रकार भी जवाब मिलने से खुश होते.

लेकिन इसके उलट, पुलिस आयुक्त का रवैया तानाशाहीपूर्ण और पत्रकार विरोधी नजर आया।
इतिहास गवाह है कि नागपुर में इससे पहले भी कई पुलिस आयुक्त रहे हैं, लेकिन आज तक किसी ने पत्रकारों से इस तरह की उद्दंड और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं किया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पुलिस आयुक्त ने पत्रकार परिषद में यह फरमान सुना दिया कि आगे से केवल अधिस्वीकृत (Accredited) पत्रकारों को ही प्रवेश दिया जाएगा।
सवाल यह है,क्राइम बीट देखने वाले कितने वरिष्ठ पत्रकार आज किसी मीडिया संस्थान से अधिस्वीकृत हैं?
इस फैसले का सीधा अर्थ है—सच पूछने वाले ज्यादातर पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाना।
इतना ही नहीं, डिजिटल मीडिया कर्मियों पर खंडणीखोर होने का आरोप भी जड़ दिया गया।
अगर 2–4 लोग गलत हैं, तो क्या पूरा डिजिटल मीडिया अपराधी हो गया?
जब रोज पुलिस विभाग के भीतर से भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, तो क्या उसी तर्क से पूरा पुलिस विभाग कटघरे में खड़ा किया जाए?
पत्रकार परिषद का अर्थ यह नहीं होता कि केवल तय सवालों के ही जवाब दिए जाएं।
शहर की कानून-व्यवस्था, बढ़ती गुंडागर्दी और अवैध धंधों पर सवाल पूछना हर पत्रकार का अधिकार है।
लेकिन जब राज्य के मुख्यमंत्री के ही शहर में पुलिस आयुक्त पत्रकारिता की आवाज दबाने की कोशिश कर रहे है,
तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि पूरे महाराष्ट्र में गृह विभाग आखिर किस दिशा में काम कर रहा है?

यह पूरा मामला अब मुख्यमंत्री कार्यालय को ई-मेल के माध्यम से एक महिला पत्रकार ने भेज देने की जानकारी प्राप्त हुई है।
अब देखना यह है कि इस पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।
और अंत में इस पूरी घटना के दौरान जो पत्रकार चुप बैठे रहे, उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता।
क्योंकि आज की पत्रकारिता सच्चाई के लिए नहीं, बल्कि नौकरी बचाने और प्रपंच चलाने के लिए की जा रही है—यह आज फिर साबित हो गया।
यह सिर्फ एक पत्रकार का अपमान नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला है।
और अगर आज सवाल पूछने की सजा मिलेगी, तो कल सच बोलने की भी कीमत चुकानी पड़ेगी।

मुकदर्शक रहें पत्रकार!
पत्रकार परिषद स्ट्रीम मीडिया से लेकर युट्युब चॅनल, न्युज पोर्टल के पत्रकार उपस्थित थे.लेकिन शहर मे चल रहें अवैध धंदे पर एक भी पत्रकार ने सवाल नही किया. ना ही सवाल करने वाले खवसे का जवाब दो बोला. सारे सीपी साहब के गोदी मीडिया बन गए. शहर कि जितनी जिम्मेदारी पुलीस प्रशासन कि उतनी ही पत्रकार कि हैं. लेकिन नागपूर शहर मे दोनो स्तंभ अवैध धंदे के गोद मे बैठे हैं इसलिये सवाल नही करते.


MIDC मे चल रहें अवैध धंदे कि खबर क्राईम ऑपरेशन ने भी दिखाई बावजुद धंदे शुरु हैं. अब देखना यह हैं कि शहर के अवैध धंदे वालो के खिलाफ कब कारवाई होती व सीपी रवींद्र सिंघल कब पत्रकार परिषद लेते!