हाईकोर्ट के आदेश से ऊपर है क्या बिना अनुमति का मंडप?
यशोधरानगर में बिना अनुमति ग्यारवी का कार्यक्रम, रात 2 बजे तक परेशान रहे रहवासी; सूचना के बावजूद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल
क्राइम ऑपरेशन -29 सप्टेम्बर 26
नागपुर शहर में सार्वजनिक अथवा परिसर में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के लिए पुलिस की अनुमति और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन कितना जरूरी है, यह सवाल एक बार फिर यशोधरानगर पुलिस थाना क्षेत्र में सामने आया है। संजीवनी कॉलोनी में कथित तौर पर बिना पुलिस अनुमति मंडप लगाकर ग्यारवी का कार्यक्रम आयोजित किए जाने और इससे स्थानीय नागरिकों को हुई परेशानी को लेकर अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, संजीवनी कॉलोनी में इलियास नामक व्यक्ति के घर के परिसर में ग्यारवी का कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के लिए मंडप लगाया गया, लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके लिए आवश्यक पुलिस अनुमति नहीं ली गई थी।
मामला सिर्फ अनुमति तक सीमित नहीं रहा। आरोप है कि मंडप लगाने के दौरान परिसर में रहने वाले लोगों पर अपने घरों के सामने खड़े दोपहिया वाहन हटाने का दबाव बनाया गया। कार्यक्रम देर रात तक जारी रहा और रात करीब 2 बजे तक स्थानीय नागरिकों को कार्यक्रम समाप्त होने का इंतजार करना पड़ा, जिसके बाद वे अपने वाहन वापस घर के सामने ला सके।
पुलिस को दोपहर में सूचना, शाम को मंडप की तस्वीर भी भेजी गई—फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
शिकायतकर्ता का कहना है कि इस पूरे मामले की जानकारी यशोधरानगर पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक यूनुस चाँद शेख को व्हाट्सऐप के माध्यम से दोपहर करीब 1 बजे दी गई थी।
इतना ही नहीं, शाम को कथित अनधिकृत मंडप की तस्वीरें भी पुलिस निरीक्षक के मोबाइल पर भेजकर मौके की स्थिति से अवगत कराया गया। इसके बावजूद शिकायतकर्ता के अनुसार न तो मौके पर कार्रवाई हुई और न ही शिकायत पर कोई स्पष्ट जवाब दिया गया।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—
जब पुलिस अधिकारी को कथित रूप से बिना अनुमति लगाए गए मंडप और नागरिकों को हो रही परेशानी की जानकारी समय रहते दे दी गई थी, तो मौके पर पुलिस की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या धार्मिक कार्यक्रम होने से नियम बदल जाते हैं?
ग्यारवी एक धार्मिक कार्यक्रम है, लेकिन शिकायतकर्ता का सवाल यह है कि कार्यक्रम का स्वरूप धार्मिक होने मात्र से क्या अनुमति और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों से छूट मिल जाती है?

यदि किसी कार्यक्रम के लिए पुलिस अथवा संबंधित प्रशासन की अनुमति आवश्यक है, तो उसका पालन आयोजन पर समान रूप से होना चाहिए, चाहे कार्यक्रम किसी भी समुदाय या वर्ग द्वारा आयोजित किया जा रहा हो।
यही समानता कानून-व्यवस्था में जनता का भरोसा कायम करती है।
हाईकोर्ट के निर्देशों के पालन पर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि उच्च न्यायालय द्वारा सार्वजनिक/धार्मिक कार्यक्रमों तथा ऐसे आयोजनों के संबंध में अनुमति और नियमों के पालन को लेकर निर्देश दिए गए हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर कथित रूप से बिना अनुमति कार्यक्रम आयोजित होने और शिकायत के बावजूद कार्रवाई न होने की स्थिति में यह जांच का विषय बन जाता है कि क्या संबंधित न्यायालयीन निर्देशों और स्थानीय प्रशासनिक नियमों का वास्तव में पालन हुआ?
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि संबंधित न्यायालयीन आदेश की *सटीक प्रति, लागू क्षेत्र और वर्तमान प्रभाव* की पुष्टि किए बिना किसी आयोजन को सीधे “हाईकोर्ट की अवहेलना” घोषित करना उचित नहीं होगा। इसलिए इस मामले में पुलिस प्रशासन को स्वयं स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यक्रम के लिए अनुमति आवश्यक थी या नहीं और यदि आवश्यक थी तो अनुमति किस आधार पर दी गई अथवा नहीं ली गई।

रात 2 बजे तक परेशान रहे रहवासी, जिम्मेदारी किसकी?
शिकायतकर्ता के अनुसार, कार्यक्रम के कारण स्थानीय लोगों को अपने ही घरों के सामने वाहन खड़े करने में परेशानी हुई। वाहनों को हटाने के लिए दबाव बनाया गया और कार्यक्रम देर रात तक चलने के कारण नागरिकों को अपने वाहन वापस लाने के लिए करीब रात 2 बजे तक इंतजार करना पड़ा।
यदि ये आरोप सही हैं, तो सवाल केवल एक कार्यक्रम का नहीं बल्कि स्थानीय नागरिकों के शांतिपूर्ण आवागमन और सार्वजनिक व्यवस्था का भी है।
किसी भी धार्मिक अथवा सामाजिक कार्यक्रम के आयोजन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन उस अधिकार के साथ आसपास रहने वाले नागरिकों की सुविधा, यातायात, सुरक्षा और निर्धारित समय-सीमा का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
क्राइम ऑपरेशन का सवाल—नियम सभी के लिए एक समान हैं या नहीं?
क्राइम ऑपरेशन का सीधा सवाल है—
अगर बिना अनुमति मंडप लगाना नियमों के विरुद्ध है, तो नियम लागू करने में पुलिस की कार्रवाई आयोजन के स्वरूप या आयोजक की पहचान देखकर क्यों बदलनी चाहिए?
और यदि इस आयोजन के लिए पुलिस अनुमति की आवश्यकता ही नहीं थी, तो पुलिस प्रशासन को सामने आकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि किस नियम के तहत अनुमति आवश्यक नहीं थी।
मामला किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि कानून के समान और निष्पक्ष पालन का है।
पुलिस की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल
शिकायतकर्ता का कहना है कि पुलिस निरीक्षक को समय रहते जानकारी दी गई, फोटो भी भेजे गए, लेकिन कार्रवाई अथवा शिकायत के संबंध में कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली।
ऐसे में अब सवाल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से है—
•क्या इस मामले की जांच की जाएगी?
•क्या कार्यक्रम के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी?
•यदि अनुमति नहीं ली गई थी तो जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई हुई?
•क्या कार्यक्रम की समय-सीमा और नागरिकों की परेशानी को लेकर कोई कार्रवाई की गई?
•और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भविष्य में किसी भी समुदाय या वर्ग के कार्यक्रम के लिए नियम समान रूप से लागू किए जाएंगे?
यशोधरानगर क्षेत्र में यदि वास्तव में बिना अनुमति कार्यक्रम आयोजित होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो पुलिस प्रशासन को केवल शिकायत आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय स्पष्ट और समान नियम लागू करने की व्यवस्था करनी होगी।
क्योंकि कानून की नजर में कार्यक्रम का नाम महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए— महत्वपूर्ण होना चाहिए नियमों का पालन।
अब देखना यह है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इस शिकायत पर क्या संज्ञान लेते हैं और क्या यशोधरानगर पुलिस से इस पूरे मामले में लिखित स्पष्टीकरण और कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी जाती है।
क्राइम ऑपरेशन की नजर इस मामले पर बनी रहेगी।
